Thursday, April 22, 2010

हसरत

पड़ी न थी अभी बुनियाद आशियाने की,
सिमट के आगई सब बिजलियाँ ज़माने की|

जवानी में था जब जोश-ऐ-मैयकशी अपना,
बड़ी हसीन थी दुनिया शराबखाने की|

परवाज़ ने ली थी अंगडाई अभी शबाब की,
नज़र लग गई हुसन पे सय्यादे कैदखाने की|

किसी से कीजिये क्या रस्मे दोस्ती का गिला,
बदल रही हैं मुकर्रम हवाये ज़माने की|

हसरत थी चुनने की सरसब्द गुलिस्ताने 'शकील',
दिल की दिल में रह गई हसरत दीवाने की|

( सरसब्द-फूलों की टोकरी में सबसे खुबसूरत और उत्तम फूल )

Saturday, April 17, 2010

कामयाब

वही रहरौं जहदे ज़िन्दगी में कामरां होगें,
इरादे जिनके पुख्ता हौसले जवाँ होगें|

जो हौसले रखते ही मौसमे खिज़ां मे,
वो ही कल इस चमन के बागबाँ होगें|

लुटा दे अपनी हस्ती जो वतन के लिए ,
वो ही इस ज़मीं के कल शाहंशाह होगें|

जो देते सहारा किसी को हर हाल मे,
वो ही'शकील'हर राज़ के राजदां होगें|

संभल जाओं ऐ वतन के रखवालों,
वरना हस्ती न तारीख़ के निशाँ होगें|

(रहरौं -मुसाफिर,जहदे-कोशिश, कामरां -कामयाब)

Thursday, April 15, 2010

सफ़र-ए- कारवाँ

निकले थे राहे ख़ुदा में,आलमे मैख्वार मिल गया,
पूछा था मस्जिद का पता कि मैकदा मिल गया|

निगाहे यास को जब कोई गुलिस्ताँ मिल गया,
बहारे-सराब में विरान -ए-खिजाँ मिल गया |

इश्क़ को ताब कहाँ सोज़े हुस्न का जहाँ में,
दिखते ही जलवा-ए-हुस्न दीवाना मिल गया |

जलती है शमा शब की तारीकियों में सारी शब,
एहले जुनून में जलने को परवाना मिल गया |

निकले थे हम अपनों की तलाश में ' शकील ',
सफ़र-ए- कारवाँ ही सारा बैगाना मिल गया |

(आलमे मैख्वार-शराबियों का समूह,मैकदा-मधुशाला,
निगाहे यास-नवमल्लिका की दृष्ठि, ताब-गर्मी,
शब की तारिकिया-रात का अँधेरा,बहारे सराब-बसंत ऋतु का भ्रम,
सोज़े हुस्न-सौन्दर्य की तपिश)

बे-वफाई

मुझ पर तेरी ज़ुल्मत कहाँ तक,
ये जफ़ा ये सितम कहाँ तक|

ये तेरे हुस्न की अदाए है याराँ,
तेरा ग़म आख़िर उठाये कहाँ तक|

सितम है या करम आजमाए कहाँ तक,
ज़ख्मे दिल अपने गिनाये कहाँ तक|

तोहमत है हम पर बे-वफाई का तेरा,
गिला अपने दिल का सुनाये कहाँ तक|

ये हुस्नों अदायों की घटाए कहाँ तक,
ये बिजलियाँ हम पर'शकील' गिरेगीं कहाँ तक|

Wednesday, April 14, 2010

यारों की मेहरबानी

परहेज़गारों को छोड़ा और मैख्वारों में आ पहुँचा,
ख्वाहिशे मै के ख़ातिर गुनहगारों में आ पहुँचा|

चमन में रहता था गुलशने यार होता था,
खारजारों में आ पहुँचा, बयाबानों में आ पहुँचा|

मैं बेगाना था रिन्दों की महफ़िल में कभी,
ग़नीमत है की महफिले मैख्वारों में आ पहुँचा|

अगर यहाँ मै से प्यार भी एक जुर्म है यारों,
फ़िर तो खातावारों में,सितमगरों में आ पहुँचा|

महलों के रंगीन नज़ारे कल की बात थी,
साकी के ज़ुल्मत भरे नाज्ज़रों में आ पहुँचा|

जो चाहते है पुर सकूँ ज़िन्दगी, उनको मुबारक हो,
मंजिले जुस्तजू था मैं की आवारों में आ पहुँचा|

भटकता फ़िर रहा था आरज़ू-ए-मंजील में'शकील',
यह यारों की मेहरबानी है की में यारों में आ पहुँचा|

Tuesday, April 13, 2010

मुहब्बत

मुहब्बत की कहाँ कोई ज़बाँ होती है,
दिल की बात नज़रों से बयाँ होती है|

दिले बेताबियों का आलम मत पूछो,
नज़रों में फिर भी हया ए वफ़ा होती है|

ज़माने की बंदिशे हो चाहे लाख,
मुहब्बत तो हर रोज़ जवाँ होती है|

क्यों पूछते हो हाले दिल उनका,
हर हाल पर उनके निगाहाँ होती है|

मिट जाये चाहे जमाने में खुद की हस्ती,
मुहब्बत फिर भी बेगुनाहाँ होती है|

मुहब्बते मर्ज़ तो मर्ज़ है दिल का'शकील',
कहाँ इलाज कहाँ कोई शिफ़ा होती है|

Monday, April 5, 2010

मैकशी

तेरे मैकदे से मुझे फिर ठुकराया गया है,
मैकशी से तेरे मैकदे में लाया गया है

लोग पीते है लड़खड़ाते हैं तेरे मैखाने में,
जामे-पैमाने से मुझे होश में लाया गया है

मैख्वार तो बहुत हैं तेरे मैखाने में साकी,
तेरे मैखाने में मुझे क्यों आज़माया गया है

मय्यसर है लबालब मै तेरे मैकदे में साकी,
मेरे होठो से लगा जाम क्यों हटाया गया है

लोग खाते है क़सम रोज़ न पीने की 'शकील',
मेरी मै-तौबा को आखिर क्यों तुड़वाया गया है