
रावण भी आज हम पर खूब मुस्करा रहा है,
उसे हर चेहरे में अपना चेहरा नज़र आ रहा है|
कहाँ ढूंढे वो मर्यादित पुरूष राम को इस भीड़ में,
उसे हर इन्सा अमर्यादित नज़र आ रहा है|
मिट जायगी उसकी हस्ती जल कर एक दम,
उसे हर इन्सा में छिपा बारूद नज़र आ रहा है|
बुराई पर अच्छाई की विजय घोष है चारो तरफ़,
उसे तो अच्छाई पर बुराई का राज नज़र आ रहा|
वो तो शर्मिंदा है अपनी करनी पर सरे-आम,
उसे हर तरफ बेशर्मी का आलम नज़र आ रहा है|
सत्य के उस युग में वो अकेला असत्य था,
उसे आज हर इन्सा झूठा नज़र आ रहा है|
हर इन्सा मुस्करा रहा है आज रावण वध पर'शकील',
पर आज दशानन्द हमारी हालत पर मुस्करा रहा है|