हम जब तेरे दस्त से गुज़र जाते है,
चेहरे पर निशाने ग़म उभर जाते है|
हमने तो पाया इश्क़ मे नशा-ए-क़दीम,
वो कैसे नशे होते जो है उतर जाते है|
इतने खौफ़ जदा है मै से शेख़ साहिब,
नाम मैकदे का लेते है तो डर जाते है|
मैकदा बंद और साक़ी भी है परेशां,
देखना है कि अब रिंद किधर जाते है|
शबे हुस्न से सीख लीजिए निज़ामे जहाँ'शकील',
सहर सादिक ही खुद ब खुद संवर जाते है|
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Thursday, March 11, 2010
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