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Thursday, March 11, 2010

नशा

हम जब तेरे दस्त से गुज़र जाते है,
चेहरे पर निशाने ग़म उभर जाते है|

हमने तो पाया इश्क़ मे नशा-ए-क़दीम,
वो कैसे नशे होते जो है उतर जाते है|

इतने खौफ़ जदा है मै से शेख़ साहिब,
नाम मैकदे का लेते है तो डर जाते है|

मैकदा बंद और साक़ी भी है परेशां,
देखना है कि अब रिंद किधर जाते है|

शबे हुस्न से सीख लीजिए निज़ामे जहाँ'शकील',
सहर सादिक ही खुद ब खुद संवर जाते है|