Thursday, March 11, 2010

नशा

हम जब तेरे दस्त से गुज़र जाते है,
चेहरे पर निशाने ग़म उभर जाते है|

हमने तो पाया इश्क़ मे नशा-ए-क़दीम,
वो कैसे नशे होते जो है उतर जाते है|

इतने खौफ़ जदा है मै से शेख़ साहिब,
नाम मैकदे का लेते है तो डर जाते है|

मैकदा बंद और साक़ी भी है परेशां,
देखना है कि अब रिंद किधर जाते है|

शबे हुस्न से सीख लीजिए निज़ामे जहाँ'शकील',
सहर सादिक ही खुद ब खुद संवर जाते है|


3 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई


    पीने के बाद भी मेरी ,मिटती नहीं तलब
    मुझको नशे से ज्यादा नशा,प्यास में रहा

    श्याम सखा
    मुझको नशे से ज्यादा नशा,पूरी गज़ल यहां देख सकते हैं
    http://gazalkbahane.blogspot.com/

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  3. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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