Sunday, December 27, 2009

दामन-ए-ख़ार

उम्रे-ए-हयात पा कर ख़ुश हो गए हम,
उनके सितम पर रह गये मुस्करा के हम|

हस्ती मिटा बेठे उनके हज़ूर जा के हम,
बेनूर हो गए उनसे नज़रे मिला के हम|

बच न सके उनके हुस्न की अदाओं से हम,
बैठे नहीं सकूँ से हुस्न को आज़मा के हम|

ग़म में ही पिन्हाँ था हमारी ख़ुशी का राज़,
ख़ुश न रह सके ग़म से निजात पा के हम|

राहे यार पे चल पड़े थे खारों पे नंगे पाँव हम,
दामन बचा न सके अपना'शकील' खारों से हम|

(पिन्हाँ-छिपा हुआ)

Thursday, December 17, 2009

दूरियाँ

मुम्किन नही की तुमसे बिछुड़ जाए हम,
बिछुड़े कभी तो अपनी मजबूरियों से हम|

दूरियाँ तो बढ़ गई है दुनिया-ए-जहाँ में,
आओं बढाए क़दम फिर इब्तिदा में हम|

ये दिल की दूरियाँ कहाँ मुनासिब है सब पे,
क्यों पूछ रहे है राहे दूरियाँ जहाँ से हम|

बेइख्तियार नाप लिया दूरियों का सितम,
शर्मिंदा हो रहे है जहाँ की दूरिओं से हम|

उनकी दूरियों ने ही सहरा दिया'शकील' हमें,
डरते है बिछुड़ न जाय दूरियों से हम|

Tuesday, December 15, 2009

तलबे मलाल

निगाहे नाज़ ने हमारा हाल बेहाल कर दिया,
ऐ हुस्ने याराँ तुने ये क्या कमाल कर दिया |

पर्दे में देख तुझे हुस्नआरा हमने सलाम कर दिया,
हिजाब तो शर्मा गया नज़रों ने कमाल कर दिया|

पर्दा नशीं तेरे सितम का बहुत-बहुत शुक्रिया,
दे कर गमे-इश्क़ मुझे तुने निहाल कर दिया|

तुझको मै याराँ क्यों हसीन सितमगर कहूँ ,
एक न चीज़ को तुने क्यों पामाल कर दिया |

अफ़सोस तो सिर्फ तेरे दीदार का है 'शकील',
तेरे निक़ाबे रुख ने हमे तलबे मलाल कर कर|

(हुस्नआरा-सुन्दर,तलब-इच्छा,पामाल-मुसीबतजदा,
मलाल-रंज )



बेतकाज़ा

ये तो तुम थे जो हमें राह दिखलाते रहे,
हम तो मंज़िलों पर भी ठोकरे खाते रहे|

तेरी रहनुमाई से हम रहे साबित क़दम,
वरना सैकड़ों दौरें तूफाँ हमें मिटाते रहे|

वो तेरी मेहरबानियाँ वो तेरा रहमों-करम,
मुश्किलों में भी हमें खूब मज़े आते रहे|

हर मन्ज़िल औज पाकर फ़ानी बन गई,
तेरी यादों को हम बार-बार दोहरते रहे|

वकारे हस्ती रौशनी-ए-अमन से ख़ाली रही,
दो चिराग़ ज़िंदगी भर अँधेरे में टकराते रहे|

ज़िंदगी भर रहा ज़ुल्मते दौराँ में गुज़र-बसर,
फिर भी अख्वासों को हम नज़र आते रहे|

बेतकाज़ा कुछ न पाया बारगाहे इश्क़ में'शकील',
क़िस्मत में ही कुछ न था हाथ फैलाते रहे|

(औज-बुलन्दी, अख्वास-दुष्ट)


Thursday, December 3, 2009

दर्द

क्या कहूँ किस से कहूँ दर्द कोई सुनता नही,
दिल की लगी ख़ुद दिल अपनी सुनता नही|

दास्ताने दर्द कहूँ किससे मै अपनी जहाँ में,
बादर्द जहाँ में बेदर्द कोई मुझे मिलता नही|

चीख़ना- चिल्लाना बेइंतिहा है दुनिया में,
क्या करूँ आवाज़ मेरी कोई सुनता नही|

बस्तियों के जहाँ में घर कोई दिखता नही,
इतने बड़े जहाँ में अहले बशर मिलता नही|

रौशन है आफ़्ताब पर कोई दिखता नही,
तन्हा है सफ़र हम सफर कोई मिलता नही|

कहाँ रुकूँ कहाँ जाऊँ इस जहाँ में 'शकील',
दूर तक कोई मुक़ाम अपना दिखता नही|


Wednesday, December 2, 2009

ग़ुस्सा

आप ग़ुस्सा ज़रा शराफ़त से कीजिये,
अदावत ही सही पर ज़रा नफ़ासत से कीजिये|

दिल का क्या आईना है टूट जायेगा ,
आप अपना वार ज़रा नज़ाकत से कीजिये|

वफ़ा न सही हम से जफ़ा ह़ी कीजिये,
मगर ख़ुद अपने दिल से ज़रा नदामत न कीजिये|

हमें कोई शिकवा न शिकायत है तुमसे,
जो भी कीजिये आप ज़रा अक़ीदत से कीजिये,

ख़ामोश निगाहों से यूँ गज़ब न कीजिये,
मेरे दिल पर वार आप ज़रा लताफ़त से कीजिये|

हया का तुम्हे वास्ता हम से पर्दा न कीजिये,
ग़ुस्सा ही सही 'शकील' आप ज़रा नज़ाबत से कीजिये|

(नफ़ासत-नर्मी से, नज़ाकत-कोमलता,वफ़ा-निर्वाह,
जफ़ा-अत्याचर,लताफत-मृदुलता,नदामत-अफ़सोस,
अक़ीदत-आस्था,नज़ाबत-शराफ़त)

Friday, November 27, 2009

इन्सान

जब इंसा से ही इंसा नफ़रत करेगा,
तो ख़ुदा से क्या मोहब्बत करेगा |

जब ख़ुद ही गुमराही पर चलेगा,
तो किस की क्या रहबरी करेगा|

बेअमल हो जब तेरी ही हयात,
तो फ़िर कैसे ख़ुद बंदगी करेगे|

उजाड़ के ख़ुद अपना चमने गुल,
तो कोई कैसे बागवानी करेगा|

बुझा दिए अपने ज़मीर के चिराग़,
तो दुनिया में कैसे रौशनी करगे|

जो ख़ुद बेहयाई की राह पर चलेगा,
फ़िर कोई क्या किसी से हया करेगा|

इन्सान तो वो है इन्सान 'शकील',
जो सारी मख्लूक़ से प्यार करेगा|

(बेअमल-निकम्मा/लोकाचार रहित,
हयात-जीवन,बेहया-बेशर्म,हया-शर्म,
मख्लूक़-मनुष्य,बंदगी-पूजा)