Thursday, April 15, 2010

सफ़र-ए- कारवाँ

निकले थे राहे ख़ुदा में,आलमे मैख्वार मिल गया,
पूछा था मस्जिद का पता कि मैकदा मिल गया|

निगाहे यास को जब कोई गुलिस्ताँ मिल गया,
बहारे-सराब में विरान --खिजाँ मिल गया |

इश्क़ को ताब कहाँ सोज़े हुस्न का जहाँ में,
दिखते ही जलवा--हुस्न दीवाना मिल गया |

जलती है शमा शब की तारीकियों में सारी शब,
एहले जुनून में जलने को परवाना मिल गया |

निकले थे हम अपनों की तलाश में ' शकील ',
सफ़र-- कारवाँ ही सारा बैगाना मिल गया |

(आलमे मैख्वार-शराबियों का समूह,मैकदा-मधुशाला,
निगाहे यास-नवमल्लिका की दृष्ठि, ताब-गर्मी,
शब की तारिकिया-रात का अँधेरा,बहारे सराब-बसंत ऋतु का भ्रम,
सोज़े हुस्न-सौन्दर्य की तपिश)

2 comments:

  1. एहसास की कोमलता और सुन्दर भाव की यह रचना

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  2. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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