Tuesday, December 15, 2009

बेतकाज़ा

ये तो तुम थे जो हमें राह दिखलाते रहे,
हम तो मंज़िलों पर भी ठोकरे खाते रहे|

तेरी रहनुमाई से हम रहे साबित क़दम,
वरना सैकड़ों दौरें तूफाँ हमें मिटाते रहे|

वो तेरी मेहरबानियाँ वो तेरा रहमों-करम,
मुश्किलों में भी हमें खूब मज़े आते रहे|

हर मन्ज़िल औज पाकर फ़ानी बन गई,
तेरी यादों को हम बार-बार दोहरते रहे|

वकारे हस्ती रौशनी-ए-अमन से ख़ाली रही,
दो चिराग़ ज़िंदगी भर अँधेरे में टकराते रहे|

ज़िंदगी भर रहा ज़ुल्मते दौराँ में गुज़र-बसर,
फिर भी अख्वासों को हम नज़र आते रहे|

बेतकाज़ा कुछ न पाया बारगाहे इश्क़ में'शकील',
क़िस्मत में ही कुछ न था हाथ फैलाते रहे|

(औज-बुलन्दी, अख्वास-दुष्ट)


1 comment:

  1. ग़ज़ल क़ाबिले-तारीफ़ है।

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